द टीएमपी स्टाफ द्वारा तैयार की गई तस्वीर
द टीएमपी स्टाफ द्वारा तैयार की गई तस्वीर

गुरुवार को चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों पर हुए चुनावों में भारत के सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने 16 सीटों पर कब्जा जमा लिया, हालांकि उसे नागपुर और वाराणसी में करारी प्रतीकात्मक हार का सामना करना पड़ा। विपक्षी दलों ने शीर्ष हिंदू राष्ट्रवादी नेतृत्व के पारंपरिक गढ़ों में मतदाताओं की नाराजगी का पूरा फायदा उठाया।

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक में हुए इन द्विवार्षिक चुनावों से देश का बंटा हुआ राजनीतिक भूगोल साफ नजर आता है।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने दक्षिणी कर्नाटक में क्लीन स्वीप करके और उत्तर भारत में अपने आधार को बचाए रखते हुए अपनी संगठनात्मक ताकत का प्रदर्शन किया। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में समाजवादी पार्टी को हराने में नाकाम रहने और आरएसएस (Rashtriya Swayamsevak Sangh) मुख्यालय वाले नागपुर में कांग्रेस द्वारा अपनी सीट बचाए रखने से बिखरे हुए विपक्षी गठबंधन को 2027 के अहम विधानसभा चुनावों से पहले एक जरूरी राजनीतिक बढ़त मिल गई है।

विधान परिषद चुनाव परिणामों का विवरण

विशेष शिक्षकों और स्नातकों के निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाली 28 विधान परिषद (MLC) सीटों पर बैलेट पेपर (मतपत्र) के जरिए वोटिंग हुई थी। बीजेपी ने अकेले 13 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ गठबंधन का कुल आंकड़ा 16 सीटों पर पहुंच गया।

राज्य लड़ी गई सीटें NDA / BJP का आंकड़ा विपक्ष का आंकड़ा मुख्य चुनावी समीकरण और रणनीतिक असर
कर्नाटक 4 4 (NDA की जीत) 0 (कांग्रेस) राज्य में विधायी बहुमत होने के बावजूद सत्तारूढ़ कांग्रेस पूरी तरह साफ हो गई।
उत्तर प्रदेश 11 6 (BJP) 5 (समाजवादी पार्टी) सपा ने वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र को अपने पास रखा और स्नातक सीट भी जीत ली; राज्य में अपनी सीटों की संख्या 3 से बढ़ाकर 5 कर ली।
बिहार 8 4 (NDA) 4 (महागठबंधन / निर्दलीय) शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच सीटों का बराबरी का बंटवारा रहा।
महाराष्ट्र 5 2 (महायुति) 3 (महा विकास अघाड़ी) कांग्रेस ने आरएसएस और फडणवीस के राजनीतिक गढ़ नागपुर स्नातक सीट पर कब्जा बरकरार रखा।
कुल 28 16 (BJP: 13, सहयोगी: 3) 12 (सपा: 5, MVA: 3, अन्य: 4) NDA के पास कुल बहुमत बरकरार; विपक्ष ने हाई-प्रोफाइल गढ़ों पर कब्जा किया।

नागपुर और वाराणसी में हाई-प्रोफाइल हार

विपक्ष की सबसे बड़ी सफलता नागपुर डिवीजन स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में देखने को मिली। इस निर्वाचन क्षेत्र में आरएसएस का राष्ट्रीय मुख्यालय आता है और यह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तथा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का निजी राजनीतिक गढ़ माना जाता है।

लगभग 40 घंटे चली लंबी प्राथमिकता वाली वोटों की गिनती के बाद कांग्रेस उम्मीदवार और मौजूदा एमएलसी अभिजीत वंजारी ने बीजेपी के उम्मीदवार सुधाकर कोहले को हरा दिया। इसके साथ ही विपक्ष ने उस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा जिसे उसने पहली बार 2020 में जीता था।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने वाराणसी में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है, जो 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र रहा है।

पार्टी ने वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र पर सफलतापूर्वक कब्जा बनाए रखा और स्नातक सीट पर भी मजबूत बढ़त हासिल कर ली। यह परिणाम 2024 के लोकसभा चुनाव के रुझान की तरह ही रहा, जहां वाराणसी में प्रधानमंत्री की जीत का अंतर 2019 के लगभग 4,80,000 वोटों से घटकर 2024 में करीब 1,50,000 वोट रह गया था।

केशव प्रसाद मौर्य, उपमुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश

इन चुनावों का फैसला अत्यधिक शिक्षित और योग्य मतदाता करते हैं। बीजेपी ने अपना पिछला प्रदर्शन दोहराया है, लेकिन हमें उम्मीद थी कि हम और अधिक सीटें जीतेंगे। हम समीक्षा करेंगे कि हम कहां पीछे रह गए।

अखिलेश यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी

अगर बीजेपी शिक्षकों और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के एमएलसी चुनावों में ऐसा कर सकती है जहां सीमित लोग वोट डालते हैं, तो कोई भी विधानसभा चुनावों के लिए उनकी तैयारी का अंदाजा लगा सकता है।

मतपत्रों पर बहस और तीखी बयानबाजी

चूंकि एमएलसी चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के बजाय बैलेट पेपर (मतपत्र) का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए इस चुनाव ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर तीखी बहस छेड़ दी। शुरुआती रुझानों के बाद सत्ता पक्ष के नेताओं ने कर्नाटक में कांग्रेस की हार का मजाक उड़ाया, जहां पार्टी राज्य की विधानसभा में सरकार चलाती है।

नरेन्‍द्र मोदी, भारत के प्रधानमंत्री

अंदाजा लगाइए कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं?

नितिन नवीन, राष्ट्रीय कार्यकारी नेता, भारतीय जनता पार्टी

जनता बार-बार कांग्रेस की अराजक राजनीति को नकार रही है। चुनाव ईवीएम से हों या बैलेट पेपर से, जनता का भरोसा प्रधानमंत्री मोदी के साथ बना हुआ है।

डॉ. सुधांशु त्रिवेदी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी

कामचोरी की आदत छोड़िए। वोट चोरी का शब्द आपके मुंह से खुद छूट जाएगा।

कांग्रेस नेतृत्व ने सत्तारूढ़ पार्टी का ध्यान वैचारिक रूप से संवेदनशील इलाकों में हुए उसके नुकसान की ओर आकर्षित करते हुए पलटवार किया।

जयराम रमेश, महासचिव, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

प्रधानमंत्री को आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है, लेकिन इसके बजाय वह दूसरों को लेक्चर दे रहे हैं। कांग्रेस की सीटें गिनने से पहले, मैं चाहूंगा कि वह इस बात पर भी विचार करें कि बीजेपी अपने ही संसदीय क्षेत्र वाराणसी में दोनों सीटें क्यों हार गई, और कैसे कांग्रेस ने आरएसएस के गढ़ नागपुर में बीजेपी को हरा दिया? मिस्टर मोदी, ट्रोलिंग बंद कीजिए।

2027 के विधानसभा चुनावों के लिए रणनीतिक मायने

भले ही शिक्षकों और यूनिवर्सिटी के स्नातकों का सीमित मतदाता वर्ग सीधे तौर पर आम मतदाताओं का बड़ा अक्श न पेश करता हो, लेकिन इन नतीजों से यह साफ पता चलता है कि हिंदी पट्टी के शहरी केंद्रों में व्हाइट-कॉलर, वेतनभोगी और शिक्षित वर्ग के बीच बीजेपी को लेकर अब भी नाराजगी या कमजोरी है।

समाजवादी पार्टी-कांग्रेस के ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन ने 2024 में उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 43 पर जीत दर्ज की थी। ऐसे में परिषद में अपनी संख्या 3 से बढ़ाकर 5 सीटें करने से उन्हें आगामी सीट-बंटवारे की बातचीत से पहले बेहतर संगठनात्मक ताकत मिल गई है।

चूंकि गठबंधन के तहत सीटों के बंटवारे पर औपचारिक बातचीत इस साल के आखिर में शुरू होने वाली है, इसलिए सबकी निगाहें उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि वैचारिक गढ़ों में सेंध लगने की ये घटनाएं उत्तर प्रदेश व महाराष्ट्र के राजनीतिक संतुलन में किसी स्थायी बदलाव का संकेत देती हैं या नहीं।